Wednesday, 10 February 2010
Tuesday, 9 February 2010
पुरानी यादें
Tuesday, 9 February 2010
4

जी हाँ दोस्तों...आपने सही पहचाना...ये हमारे माननीय पूर्व वार्डेन साहब चिचड़ जी हैं...
खैर अब तो ये अपने पद पर नहीं रहे....पर इनकी कमी अब भी खलती है...
ये हमारे रूम में चाय पीने आये थे....कृपया इनके आगमन को भुख्लंदी का नाम देकर इनका अनादर न करें...
Monday, 8 February 2010
SYLLABUS OF ALL 8 SEMESTERS FOR ALL THE STREAMS UNDER K.U.K
Monday, 8 February 2010
0
FOR THE SYLLABUS OF ENGINEERING OF ALL THE STREAMS UNDER
KURUKSHETRA UNIVERSITY KINDLY CLICK HERE
REGARDS :
RAHUL CHADHA
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2004-08 batch
URGENT TO ALL CONCERNED PEOPLE
Here is a requirement of Ms-Office 2007. If anybody have this, please provide here a full version link of it.
Urgent requirement.........
Urgent requirement.........
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सहायता करो
Sunday, 7 February 2010
Saturday, 6 February 2010
Oh Shitttt.........So Painful
Saturday, 6 February 2010
2
दर्द क्या होता है ये इस हरी शर्ट वाले से बेहतर कौन जान सकता है।शायद इसे ही तो कहते है खड़े L**D पे लात।
क्या आप लोग इस फोटो के लिए कोई अछी सी heading दे सकते हो.
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Krantikaari
BEWARE OF DOGS.....MEANS......कुत्तो से सावधान.
तो आज आपको पता लग ही गया होगा की Beware Of Dogs का क्या मतलब होता है। खास तोर पे ये फोटो उन लडकियों के लिए है जिन्हें कुत्तो से बहुत प्यार होता है। और जो बात बात में ये कहती है की ALL MENS ARE DOG.अब दोबारा मत कहना। ठीक है ............??????
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खतरनाक शिकारी
Bas Kar Dalo.......
Shayad yehi matlab hota hai is " JUST DO IT " Ka.......To isme in bhai saab ki kya galti hai ???????
Ye bhi to wahi kar rahe hai jo likha hua hai......
Keep it up !!!!!!!!
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शेर-ए-वजीरिस्तान उर्फ़ कल्लू
जरा संभल के मैडम....
क्या कोई ऐसा इंसान है जो ये बता सके की ये मैडम अब क्या सोच रही है........Isme in madam ki koi mistake nahi hai.......Ye to sab new generation style hai.
Socho ki ye madam ab kya करेगी ।
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गझिनी उर्फ़ धर्मात्मा
What is LECTURE ?
LECTURE:
An art of transmitting Information
from the notes of the lecturer
to the notes of students
without passing through the minds
of either
An art of transmitting Information
from the notes of the lecturer
to the notes of students
without passing through the minds
of either
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Definitions
Thursday, 4 February 2010
पुरुषों पर अत्याचार ????
Thursday, 4 February 2010
2
महिला अधिकारों की जब बात उठती है तो महिलाएं क्या मांगती हैं? जाहिर है बराबरी का अधिकार। लेकिन अगर बराबरी की मांग करते-करते कोई खुद शोषणकारी की तरह बर्ताव करने लगे तो.... कम से कम कुछ मामलों में तो यही हो रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अभी भी कई जगह खासकर गांवों में महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है और उन्हें उनके अधिकार दिलाने के लिए जितना भी किया जाए वह कम है लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या भी बढ़ रही है जो अपने हक के लिए मिले कानून का दुरूपयोग कर रही हैं। और कानून भी इसमें मूकदर्शक बने रहने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है।
मेरा एक मित्र है जिसने कुछ दिनों पत्रकारिता की और अब लॉ करने के बाद एक सीनियर क्रिमिनल लॉयर के साथ ट्रेनिंग ले रहा है। कुछ ही दिन पहले वह मिला और इतना व्यथित था कि पूछिए मत। वजह पूछने पर बताया कि यार गलत काम मैं कर नहीं सकता और न करूं तो वकालत करने का सपना छोड़ना पड़ेगा। और मेरे पैरंट्स मुझे समझने की बजाय मुझे प्रैक्टिकल बनने की सलाह दे रहे हैं। हुआ यूं कि कुछ दिन पहले उसके सीनियर के पास एक महिला आई। पढ़ी लिखी और मॉडर्न। उसने अपने 2 साल पुराने पति और उसके पैरंट्स के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के तहत केस दर्ज कराया था। वह वकील से कहने लगी कि मैं अपने पति और उसके पूरे परिवार को जेल में देखना चाहती हूं चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। आप चाहें तो सबूत क्रिएट करने के लिए मैं अपने शरीर पर सिगरेट से दागने के निशान बना सकती हूं। इतना बताया ही था कि मेरा वह दोस्त बुरी तरह बरस पड़ा। उसने बताया कि एक हफ्ते से वह सीनियर लॉयर के पास नहीं गया है क्योंकि जब उसने उनसे कहा कि सर ये तो गलत है तो उन्होंने उसे ही लेक्चर दे डाला।
एक वाकया और याद आ रहा है जब मैं कॉलेज में स्टूडेंट यूनियन में थी। एक 22 साल के लड़के को रेप के आरोप में गिरफ्तार किया गया। कुछ सीनियर पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दरअसल मामला कुछ और ही है। वह लड़का एक कॉल गर्ल के पास गया और बाद में पैसों को लेकर कुछ बहस हुई और 40 रुपये को लेकर उसने लड़के पर रेप का केस कर दिया। मेडिकल टेस्ट में भी उसकी पुष्टि हो गई। पुलिस वाले हकीकत जानते हुए भी कुछ नहीं कर सके और उस लड़के को सजा हो गई।
मेरा यह कहने का कतई मतलब नहीं है कि कानून गलत है लेकिन कानून का गलत इस्तेमाल जरूर हो रहा है। आप यह भी कह सकते हैं कि महिलाओं को अतिरिक्त अधिकार देने का ही नहीं बल्कि मर्डर जैसे सारे कानूनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है तो... हां मैं भी इससे सहमत हूं। लेकिन कुछ तो ऐसा करना ही होगा जिससे बेगुनाह को सजा ना मिले। और महिला अधिकारों के नाम पर कुछ बेचारे पुरुष ना पिसें।
अभी हाल ही में उत्तराखण्ड में एक अजीब वाकया घटा। जब दुल्हन सुहागरात से ठीक पहले अपने प्रेमी के साथ भाग गई। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया। लेकिन जेल गया सिर्फ प्रेमी। जबकि दोनों अपनी मर्जी से भागे थे। लड़की ने अपने प्रेमी से कहा था कि अगर वो सुहागरात से पहले उसे भगा नहीं ले गया तो वो जहर खा लेगी। पुलिस के सामने खुद लड़की ने ये बयान दिया लेकिन कानून का शिकंजा कसा सिर्फ लड़के पर। अगर लड़की कोर्ट में बयान देने तक अपने कहे पर कायम रहती है, तो शायद युवक बच जाए। लेकिन अगर किसी दबाव में या किसी और वजह से वह मुकर गई तो? बेचारा प्रेमी...
अदालतें खुद कई बार यह मान चुकी हैं कि कई बार महिलाएं बदला लेने के मकसद से झूठे केस दर्ज करवा देती हैं और महिला के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानून बेगुनाह पुरुष के उत्पीड़न के हथियार बन जाते हैं। इतिहास में पढ़ा था कि एक दौर में मातृ सत्ता हुआ करती थी। तब महिलाओं की तूती बोलती थी। फिर वक्त बदला और पुरूषों ने सत्ता पर कब्जा जमा डाला और महिलाओं के शोषण की ऐसी काली किताब लिखी कि लाख धोने पर भी शायद ही धुले। आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरूषों के साथ भी वही सबकुछ नहीं होने लगा है। भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जाए...। लेनिन ने कहा था कि सत्ता इंसान को पतित करती है या यूं कहें पावर जिसके पास होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता। लेकिन क्या ऐसे कभी समानता आ सकती है? या फिर ये चक्र ऐसे ही घूमता रहेगा। कभी हम मरेंगें... कभी तुम मरोगे।
मेरा एक मित्र है जिसने कुछ दिनों पत्रकारिता की और अब लॉ करने के बाद एक सीनियर क्रिमिनल लॉयर के साथ ट्रेनिंग ले रहा है। कुछ ही दिन पहले वह मिला और इतना व्यथित था कि पूछिए मत। वजह पूछने पर बताया कि यार गलत काम मैं कर नहीं सकता और न करूं तो वकालत करने का सपना छोड़ना पड़ेगा। और मेरे पैरंट्स मुझे समझने की बजाय मुझे प्रैक्टिकल बनने की सलाह दे रहे हैं। हुआ यूं कि कुछ दिन पहले उसके सीनियर के पास एक महिला आई। पढ़ी लिखी और मॉडर्न। उसने अपने 2 साल पुराने पति और उसके पैरंट्स के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के तहत केस दर्ज कराया था। वह वकील से कहने लगी कि मैं अपने पति और उसके पूरे परिवार को जेल में देखना चाहती हूं चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। आप चाहें तो सबूत क्रिएट करने के लिए मैं अपने शरीर पर सिगरेट से दागने के निशान बना सकती हूं। इतना बताया ही था कि मेरा वह दोस्त बुरी तरह बरस पड़ा। उसने बताया कि एक हफ्ते से वह सीनियर लॉयर के पास नहीं गया है क्योंकि जब उसने उनसे कहा कि सर ये तो गलत है तो उन्होंने उसे ही लेक्चर दे डाला।
एक वाकया और याद आ रहा है जब मैं कॉलेज में स्टूडेंट यूनियन में थी। एक 22 साल के लड़के को रेप के आरोप में गिरफ्तार किया गया। कुछ सीनियर पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दरअसल मामला कुछ और ही है। वह लड़का एक कॉल गर्ल के पास गया और बाद में पैसों को लेकर कुछ बहस हुई और 40 रुपये को लेकर उसने लड़के पर रेप का केस कर दिया। मेडिकल टेस्ट में भी उसकी पुष्टि हो गई। पुलिस वाले हकीकत जानते हुए भी कुछ नहीं कर सके और उस लड़के को सजा हो गई।
मेरा यह कहने का कतई मतलब नहीं है कि कानून गलत है लेकिन कानून का गलत इस्तेमाल जरूर हो रहा है। आप यह भी कह सकते हैं कि महिलाओं को अतिरिक्त अधिकार देने का ही नहीं बल्कि मर्डर जैसे सारे कानूनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है तो... हां मैं भी इससे सहमत हूं। लेकिन कुछ तो ऐसा करना ही होगा जिससे बेगुनाह को सजा ना मिले। और महिला अधिकारों के नाम पर कुछ बेचारे पुरुष ना पिसें।
अभी हाल ही में उत्तराखण्ड में एक अजीब वाकया घटा। जब दुल्हन सुहागरात से ठीक पहले अपने प्रेमी के साथ भाग गई। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया। लेकिन जेल गया सिर्फ प्रेमी। जबकि दोनों अपनी मर्जी से भागे थे। लड़की ने अपने प्रेमी से कहा था कि अगर वो सुहागरात से पहले उसे भगा नहीं ले गया तो वो जहर खा लेगी। पुलिस के सामने खुद लड़की ने ये बयान दिया लेकिन कानून का शिकंजा कसा सिर्फ लड़के पर। अगर लड़की कोर्ट में बयान देने तक अपने कहे पर कायम रहती है, तो शायद युवक बच जाए। लेकिन अगर किसी दबाव में या किसी और वजह से वह मुकर गई तो? बेचारा प्रेमी...
अदालतें खुद कई बार यह मान चुकी हैं कि कई बार महिलाएं बदला लेने के मकसद से झूठे केस दर्ज करवा देती हैं और महिला के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानून बेगुनाह पुरुष के उत्पीड़न के हथियार बन जाते हैं। इतिहास में पढ़ा था कि एक दौर में मातृ सत्ता हुआ करती थी। तब महिलाओं की तूती बोलती थी। फिर वक्त बदला और पुरूषों ने सत्ता पर कब्जा जमा डाला और महिलाओं के शोषण की ऐसी काली किताब लिखी कि लाख धोने पर भी शायद ही धुले। आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरूषों के साथ भी वही सबकुछ नहीं होने लगा है। भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जाए...। लेनिन ने कहा था कि सत्ता इंसान को पतित करती है या यूं कहें पावर जिसके पास होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता। लेकिन क्या ऐसे कभी समानता आ सकती है? या फिर ये चक्र ऐसे ही घूमता रहेगा। कभी हम मरेंगें... कभी तुम मरोगे।
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तो दाऊद को भी अपने घर बुला लेंगे ठाकरे?
शिवसेना शुरू से स्टंट की राजनीति करती रही है। यह राजनीति कुछ समय के लिए पॉप्युलर भले हो जाए, कोई समस्या नहीं सुलझाती। चार दशकों की राजनीति में ठाकरे ने महाराष्ट्र की कोई समस्या नहीं सुलझाई। पार्टी राज्य में भी सत्ता में आई और केंद्र में भी, मगर मराठी अस्मिता के सवाल पर भी महाराष्ट्र में या मुंबई में हालात बेहतर होने का दावा खुद शिवसेना भी नहीं कर सकती।
फिर भी, ठाकरे उसी शैली में राजनीति करने को मजबूर हैं, क्योंकि अब राज ठाकरे के रूप में उनका नया राइवल उभर आया है। पूरी जिंदगी मराठी राजनीति करने के बाद उन्हें प्रदेश की मराठी जनता के सामने एक बार फिर खुद को साबित करना है। नहीं कर सके तो खारिज कर दिए जाएंगे। खारिज करने की यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह बात पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ठाकरे देख चुके हैं। इसीलिए राजनीतिक वानप्रस्थ से वापस आकर उन्होंने उद्धव के हाथों में सौंपी जा चुकी कमान एक बार फिर अपने हाथ में ली है।
एक बार फिर शिवसेना सब कुछ भूल मराठी मुद्दे पर टूट पड़ी है। बार-बार ठोकर लग रही है, लेकिन ठाकरे इतने बदहवास हैं कि संभल नहीं पा रहे। सचिन तेंडुलकर ने उन्हें संभालने की कोशिश की, यह कह कर कि मुंबई सबकी है, पर ठाकरे ने उसी से पंगा ले लिया। मुंह की खानी पड़ी, पर रवैया वही रहा। मुकेश अंबानी ने भी खरी-खरी सुना दी, लेकिन ठाकरे बेअसर। आखिरी वार संघ ने किया। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत खुद महाराष्ट्र के हैं, पर उन्होंने भी साफ कह दिया कि मुंबई सभी भारतीयों की है। बीजेपी ने भी संघ का इशारा समझ कर अपना रवैया साफ कर दिया कि वह इस मुद्दे पर सेना का साथ नहीं दे सकती। मगर, ठाकरे पर कोई असर फिर भी नहीं दिख रहा है।
यह अड़ियस रुख तारीफ के काबिल होता, अगर इसके पीछे ठाकरे की प्रतिबद्धता होती। प्रतिबद्धता नहीं है, यह बात आज से नहीं, काफी पहले से जाहिर होती रही है। ठाकरे का विरोध सहूलियतों पर आधारित रहा है। वे गुलाम अली का विरोध करते हैं तो माइकल जैक्सन को अपने घर बुला लेते हैं।
पुराने मामलों को भुला दें तो आज भी वह शाहरुख की फिल्म को इसलिए रिलीज नहीं होने दे रहे क्योंकि शाहरुख ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों की तारीफ करने वाला बयान दिया। आमिर से भी उनकी यही शिकायत है। मगर, वह खुद पाकिस्तानी क्रिकेटर जावेद मियांदाद को अपने घर 'मातो श्री' बंगले में बुला चुके हैं। इस पर सफाई देते हुए शिवसेना के नेता कह रहे हैं कि 'मियांदाद पाकिस्तानी खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर ठाकरे से मिलने आए थे।' इसका क्या मतलब? आइपीएल में पाकिस्तान से आए खिलाड़ी भी व्यक्तिगत हैसियत से ही आए थे, वे पाकिस्तानी टीम का हिस्सा नहीं थे।
दूसरी बात, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यही मियांदाद कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम के समधी हैं। ऐसे आदमी से ठाकरे को क्या काम हो गया? वह कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते ठाकरे इस आदमी की अपने घर पर मेजबानी करने को राजी हुए? यह कहने का मतलब नहीं है कि मियांदाद खुद मिलना चाहते थे। कल को हो सकता है दाऊद भी उनसे मिलना चाहे। तो क्या वह दाऊद का भी अपने बंगले पर स्वागत करेंगे?
फिर भी, ठाकरे उसी शैली में राजनीति करने को मजबूर हैं, क्योंकि अब राज ठाकरे के रूप में उनका नया राइवल उभर आया है। पूरी जिंदगी मराठी राजनीति करने के बाद उन्हें प्रदेश की मराठी जनता के सामने एक बार फिर खुद को साबित करना है। नहीं कर सके तो खारिज कर दिए जाएंगे। खारिज करने की यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह बात पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ठाकरे देख चुके हैं। इसीलिए राजनीतिक वानप्रस्थ से वापस आकर उन्होंने उद्धव के हाथों में सौंपी जा चुकी कमान एक बार फिर अपने हाथ में ली है।
एक बार फिर शिवसेना सब कुछ भूल मराठी मुद्दे पर टूट पड़ी है। बार-बार ठोकर लग रही है, लेकिन ठाकरे इतने बदहवास हैं कि संभल नहीं पा रहे। सचिन तेंडुलकर ने उन्हें संभालने की कोशिश की, यह कह कर कि मुंबई सबकी है, पर ठाकरे ने उसी से पंगा ले लिया। मुंह की खानी पड़ी, पर रवैया वही रहा। मुकेश अंबानी ने भी खरी-खरी सुना दी, लेकिन ठाकरे बेअसर। आखिरी वार संघ ने किया। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत खुद महाराष्ट्र के हैं, पर उन्होंने भी साफ कह दिया कि मुंबई सभी भारतीयों की है। बीजेपी ने भी संघ का इशारा समझ कर अपना रवैया साफ कर दिया कि वह इस मुद्दे पर सेना का साथ नहीं दे सकती। मगर, ठाकरे पर कोई असर फिर भी नहीं दिख रहा है।
यह अड़ियस रुख तारीफ के काबिल होता, अगर इसके पीछे ठाकरे की प्रतिबद्धता होती। प्रतिबद्धता नहीं है, यह बात आज से नहीं, काफी पहले से जाहिर होती रही है। ठाकरे का विरोध सहूलियतों पर आधारित रहा है। वे गुलाम अली का विरोध करते हैं तो माइकल जैक्सन को अपने घर बुला लेते हैं।
पुराने मामलों को भुला दें तो आज भी वह शाहरुख की फिल्म को इसलिए रिलीज नहीं होने दे रहे क्योंकि शाहरुख ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों की तारीफ करने वाला बयान दिया। आमिर से भी उनकी यही शिकायत है। मगर, वह खुद पाकिस्तानी क्रिकेटर जावेद मियांदाद को अपने घर 'मातो श्री' बंगले में बुला चुके हैं। इस पर सफाई देते हुए शिवसेना के नेता कह रहे हैं कि 'मियांदाद पाकिस्तानी खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर ठाकरे से मिलने आए थे।' इसका क्या मतलब? आइपीएल में पाकिस्तान से आए खिलाड़ी भी व्यक्तिगत हैसियत से ही आए थे, वे पाकिस्तानी टीम का हिस्सा नहीं थे।
दूसरी बात, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यही मियांदाद कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम के समधी हैं। ऐसे आदमी से ठाकरे को क्या काम हो गया? वह कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते ठाकरे इस आदमी की अपने घर पर मेजबानी करने को राजी हुए? यह कहने का मतलब नहीं है कि मियांदाद खुद मिलना चाहते थे। कल को हो सकता है दाऊद भी उनसे मिलना चाहे। तो क्या वह दाऊद का भी अपने बंगले पर स्वागत करेंगे?
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Just SMS for BLOOD
I have got this message today and liked to share with you all…
Now it has become easier to get the blood we need.
All you have to do is just type
“BLOOD
EX: “BLOOD B+”
A BLOOD DONOR WILL CALL YOU!!!
For more info Click Here
This service will help minimize the time spent on searching for safe blood and help save more lives. So please pass this message to all.
It’s a Must to Know & Share. Do it now….
Forward this to all your friends whom you care ….as the minute you spare to share this information can save somebody’s life with rare Blood Group! If you couldn’t be a Donor be a Communicator!!!
Source : Times of india
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